Thursday, July 31, 2008

कुछ मेरी पसन्द की क्षणिकाएं


जानकर उसकी जरूरत
जब बढ़ाया हाथ मैने
वो देखने लगा मुझको
शक की निगाहों से...


उसका डर नही है
जो दे रहा है दिखाई
डरती हूँ उस शख्स से
जो छिपा है मुखौटे के पीछे...


कहती है तनहाई अक्सर मुझसे
तुम अकेली कहाँ हो
मै जो रहती हूँ सदैव
लिपटी हुई तुम्से...

मौत ने जिन्दगी पर
जब किये हस्ताक्षर
वो था एक और जिन्दगी के
जन्म लेने का
पहला दिन...

तेज़ ठण्डी हवाओं के
गुजरते तूफ़ान में भी
धधक रही है एक ज्वाला सी
मेरे मन में
और मेरी सवेंदनाएं
पिंघल रही है
मोम की तरह...

सुनीता शानू

10 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत दिनो बाद आप की कविता देखी, बहुत सुन्दर, ओर भावूक ओर इन लाईनो ने बहुत सोचने पर मजबुर कर दिया...
मौत ने जिन्दगी पर
जब किये हस्ताक्षर
वो था एक और जिन्दगी के
जन्म लेने का
पहला दिन...
धन्यवाद सुन्दर कविता के लिये

मोहन वशिष्‍ठ said...

कहती है तनहाई अक्सर मुझसे
तुम अकेली कहाँ हो
मै जो रहती हूँ सदैव
लिपटी हुई तुम्से...

wah ji bahut hi khoobsoorat very nice poetry and very nice blog

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा, क्या बात है!

मीनाक्षी said...

घुघुतीजी की कविता पर आपकी टिप्पणी पाकर लगा कि आप हमारे आसपास ही कही हैं..सो यहाँ पहुँच ही गए...इसी बहाने आपकी भावभीनी क्षणिकाएँ भी पढ लीं..

SAHITYIKA said...

nice lines..

amitabhpriyadarshi said...

gagar men sagar bhar diya aapne.


khaalee panne

Prakash Badal said...

मौत ने जिन्दगी पर
जब किये हस्ताक्षर
वो था एक और जिन्दगी के
जन्म लेने का
पहला दिन.

वाह! कया खूव के वो था जन्म लेने का पहला दिन---- लिखती रहें

अबयज़ ख़ान said...

ये जिन्दगी एक खूबसूरत कविता है,...और मै इसे जी भर के जीना चाहती हूँ,.... मुझे तो आपके ब्लॉग की ये लाइन ही बहुत खूबसूरत लगीं। कमाल का ब्लॉग है।

kavi kulwant said...

अरे बाबा, आपने कितने अकाउंट खोल लिये..इत्ने स्विस अकाउंट्स पर नज़र कौन रखेगा...

kavi kulwant said...

जानकर उसकी जरूरत
जब बढ़ाया हाथ मैने
वो देखने लगा मुझको
शक की निगाहों से...

कहती है तनहाई अक्सर मुझसे
तुम अकेली कहाँ हो
मै जो रहती हूँ सदैव
लिपटी हुई तुमसे...

..कुछ खास और बहुत कुछ कहती हैं यह दो क्षणिकाएं....