Thursday, July 31, 2008

कुछ मेरी पसन्द की क्षणिकाएं


जानकर उसकी जरूरत
जब बढ़ाया हाथ मैने
वो देखने लगा मुझको
शक की निगाहों से...


उसका डर नही है
जो दे रहा है दिखाई
डरती हूँ उस शख्स से
जो छिपा है मुखौटे के पीछे...


कहती है तनहाई अक्सर मुझसे
तुम अकेली कहाँ हो
मै जो रहती हूँ सदैव
लिपटी हुई तुम्से...

मौत ने जिन्दगी पर
जब किये हस्ताक्षर
वो था एक और जिन्दगी के
जन्म लेने का
पहला दिन...

तेज़ ठण्डी हवाओं के
गुजरते तूफ़ान में भी
धधक रही है एक ज्वाला सी
मेरे मन में
और मेरी सवेंदनाएं
पिंघल रही है
मोम की तरह...

सुनीता शानू